मकर संक्रांति पर खुलते हैं 'मोक्ष' के द्वार—क्यों भीष्म पितामह ने प्राण त्यागने के लिए किया था उत्तरायण का इंतजार? जानें शास्त्रों का वो रहस्य
नई दिल्ली/हरिद्वार, [दिनांक: 14 जनवरी 2026] — भारतीय संस्कृति और सनातन धर्म में पर्व केवल उत्सव नहीं, बल्कि खगोलीय घटनाओं और आध्यात्मिक चेतना का संगम होते हैं। इसी श्रृंखला में आज देश भर में मकर संक्रांति (Makar Sankranti) का पावन पर्व मनाया जा रहा है। यह वह दिन है जब प्रत्यक्ष देवता भगवान सूर्य नारायण (Sun God) अपनी दिशा बदलते हैं और धनु राशि से निकलकर अपने पुत्र शनि की राशि 'मकर' में प्रवेश करते हैं।
शास्त्रों में इस दिन का महत्व इतना अधिक बताया गया है कि इसे 'देवताओं का दिन' कहा जाता है। मकर संक्रांति केवल तिल-गुड़ खाने का त्योहार नहीं है, बल्कि यह अंधकार से प्रकाश की ओर जाने का एक महापर्व है। आइए जानते हैं कि गीता से लेकर महाभारत तक, हमारे धर्मग्रंथों में इस दिन के बारे में क्या कहा गया है और क्यों इसे मोक्ष (Salvation) का द्वार माना जाता है।
उत्तरायण: देवताओं का दिन और मोक्ष का मार्ग
मकर संक्रांति के दिन से सूर्य भगवान दक्षिणायन से उत्तरायण (Uttarayan) गति करने लगते हैं। शास्त्रों के अनुसार, उत्तरायण देवताओं का 'दिन' है और दक्षिणायन देवताओं की 'रात्रि'।
- सकारात्मकता का संचार: सूर्य के उत्तरायण होते ही पृथ्वी पर प्रकाश और सकारात्मक ऊर्जा का प्रभाव बढ़ जाता है। इसीलिए यह समय आध्यात्मिक उन्नति, जप, तप और शुभ कार्यों (जैसे विवाह, मुंडन, गृह प्रवेश) के लिए सर्वश्रेष्ठ माना जाता है।
- छह माह का दिन: आज से देवताओं का छह माह का दिन आरंभ होता है, जो आषाढ़ मास तक रहता है।
गीता का ज्ञान: प्रकाश में देह त्यागने से नहीं होता पुनर्जन्म
श्रीमद्भागवत गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं उत्तरायण की महिमा का बखान किया है। उन्होंने जीवन और मृत्यु के चक्र को सूर्य की स्थिति से जोड़ते हुए एक गहरा रहस्य बताया है।
भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं:
"जब सूर्यदेव उत्तरायण होते हैं और पृथ्वी प्रकाशमय रहती है (अग्नि, ज्योति, दिन और शुक्ल पक्ष), तो इस प्रकाश में शरीर का परित्याग करने वाले योगी और ज्ञानीजन ब्रह्म को प्राप्त होते हैं। उनका पुनर्जन्म नहीं होता। इसके विपरीत, सूर्य के दक्षिणायन होने पर (धुआं, रात्रि और कृष्ण पक्ष) शरीर त्याग करने पर जीव को पुनर्जन्म के चक्र में फंसना पड़ता है।"
गीता के अनुसार उत्तरायण को 'देवयान' (देवताओं का मार्ग) और दक्षिणायन को 'पितृयान' (पितरों का मार्ग) कहा जाता है।
महाभारत का प्रसंग: बाणों की शैया पर भीष्म की प्रतिज्ञा
उत्तरायण के महत्व का सबसे बड़ा प्रमाण महाभारत काल में मिलता है। कुरुक्षेत्र के युद्ध में जब भीष्म पितामह (Bhishma Pitamah) को अर्जुन के बाणों ने छलनी कर दिया था और वे बाणों की शैया पर गिर पड़े थे, तब भी उन्होंने अपने प्राण नहीं त्यागे।
- इच्छा मृत्यु: भीष्म पितामह को इच्छा मृत्यु का वरदान प्राप्त था। उस समय सूर्य दक्षिणायन में थे। भीष्म जानते थे कि दक्षिणायन में शरीर त्यागने से मोक्ष की प्राप्ति कठिन होती है।
- प्रतीक्षा: उन्होंने असहनीय पीड़ा सहते हुए भी अपनी अंतिम सांसों को रोककर रखा और सूर्य के उत्तरायण होने की प्रतीक्षा की। मकर संक्रांति के दिन जैसे ही सूर्य उत्तरायण हुए, उन्होंने अपना नश्वर शरीर त्याग दिया और मोक्ष को प्राप्त हुए।
गंगासागर और भगीरथ की तपस्या
मकर संक्रांति का संबंध केवल सूर्य से नहीं, बल्कि मोक्षदायिनी माँ गंगा से भी है। पौराणिक कथाओं के अनुसार:
- गंगा का अवतरण: शास्त्रों के मुताबिक, मकर संक्रांति के दिन ही भगवान विष्णु के चरणों से निकली देवी गंगा, राजा भगीरथ के पीछे-पीछे चलकर कपिल मुनि के आश्रम से होती हुई सागर में जा मिली थीं।
- सगर पुत्रों की मुक्ति: इसी दिन भगीरथ के पूर्वज और महाराज सगर के 60,000 पुत्रों को गंगा जल के स्पर्श से मुक्ति (मोक्ष) मिली थी।
- तर्पण: महाराज भगीरथ ने इसी दिन अपने पूर्वजों का गंगाजल, अक्षत और तिल से श्राद्ध तर्पण किया था। यही कारण है कि आज के दिन पश्चिम बंगाल के गंगासागर (जहां गंगा समुद्र में मिलती हैं) में कपिल मुनि के आश्रम पर एक विशाल मेला लगता है। मान्यता है कि "सारे तीरथ बार-बार, गंगासागर एक बार।"
स्नान और दान: अक्षय पुण्य की प्राप्ति
मकर संक्रांति पर पवित्र नदियों में स्नान और दान का विशेष महत्व है।
- पाप मुक्ति: इस समय पवित्र नदियों (विशेषकर गंगा, यमुना, गोदावरी) में किया गया स्नान सभी पापों से मुक्ति दिलवाने वाला होता है।
- अक्षय पुण्य: इस दिन किया गया दान (विशेषकर तिल, गुड़, खिचड़ी, कंबल) कभी क्षय नहीं होता यानी उसका पुण्य कई जन्मों तक मिलता है। मान्यता है कि आज के दिन यज्ञ में दिए गए हव्य (आहुति) को ग्रहण करने के लिए देवता स्वयं धरती पर अवतरित होते हैं।
हमारी राय (The Trending People Analysis)
मकर संक्रांति केवल एक खगोलीय घटना नहीं है, बल्कि यह प्रकृति और परमात्मा के बीच के संतुलन का उत्सव है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखें तो आज से दिन बड़े होने लगते हैं और रातों की अवधि कम होने लगती है, जो जीवन में अंधकार पर प्रकाश की विजय का प्रतीक है।
The Trending People का विश्लेषण है कि भीष्म पितामह का प्रसंग हमें धैर्य और सही समय (Timing) का महत्व सिखाता है। आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में हम अक्सर शुभ और अशुभ समय की गणना भूल जाते हैं, लेकिन हमारे शास्त्र हमें याद दिलाते हैं कि ब्रह्मांड की हर गतिविधि का हमारे जीवन और मृत्यु पर गहरा प्रभाव पड़ता है। यह पर्व हमें अपनी जड़ों, पूर्वजों और प्रकृति के प्रति कृतज्ञ होने का अवसर देता है।
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